भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में बंग भंग आंदोलन (जिसे स्वदेशी आंदोलन भी कहा जाता है) एक बहुत ही महत्वपूर्ण मोड़ था। यह आंदोलन अंग्रेजों की सोची-समझी राजनीतिक चाल और फूट डालो राज करो की नीति के खिलाफ भारतीयों का पहला बड़ा सामूहिक विरोध था। आंदोलन की पृष्ठभूमि (Background) 20वीं सदी की शुरुआत में बंगाल भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका था। इस तेजी से बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव को कम करने और भारतीयों की एकता को तोड़ने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्जन ने सन 1905 ईस्वी में बंगाल को दो भागों में विभाजित करने का निर्णय लिया। विभाजन का कारण: दिखावा बनाम हकीकत ब्रिटिश सरकार का बहाना: अंग्रेजों ने कागजों पर यह दिखाया कि बंगाल बहुत बड़ा प्रांत है, इसलिए प्रशासनिक व्यवस्था (Administration) को बेहतर बनाने के लिए इसका विभाजन ज़रूरी है। वास्तविक कारण: अंग्रेजों का असली मकसद राजनीतिक था। वे हिंदू और मुसलमान लोगों में फूट डालकर राष्ट्रवाद की भावना को कुचलना चाहते थे। बंगाल का विभाजन कैसे हुआ? ब्रिटिश सरकार ने बंगाल प्रेसीडेंसी प्रांत को धार्मिक आधार पर दो हिस्सों में बांट दिया: पश्चिम बंगाल: इस हिस्से में हिंदू आबादी बहुसंख्यक (अधिक) थी। पूर्वी बंगाल: इस हिस्से में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक थी (यह क्षेत्र आज का बांग्लादेश है)। आंदोलन की शुरुआत और व्यापक असर राष्ट्रव्यापी आक्रोश: इस विभाजन की घोषणा होते ही पूरे बंगाल और देश भर में रोष की लहर दौड़ गई। 16 अक्टूबर 1905 (विभाजन के दिन) को पूरे बंगाल में 'शोक दिवस' के रूप में मनाया गया। नेताओं की एकजुटता: कांग्रेस के नरम दल और गरम दल के नेताओं ने अपने मतभेदों को भुलाकर एक साथ मिलकर इस आंदोलन को एक मजबूत नेतृत्व दिया। स्वदेशी और बहिष्कार: इस आंदोलन के तहत विदेशी सामानों और कपड़ों का बहिष्कार किया गया और स्वदेशी चीजों को अपनाने पर जोर दिया गया। मुस्लिम लीग की स्थापना: इसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, आगे चलकर सन 1906 ईस्वी में ढाका में भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। आंदोलन का परिणाम भारतीयों के कड़े विरोध और बढ़ते क्रांतिकारी आंदोलनों के आगे आखिरकार ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। साल 1911 ईस्वी में दिल्ली दरबार में बंगाल के विभाजन को रद्द (वापस) कर दिया गया
Read Full Blog