Blog by Sanjeev panday | Digital Diary

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धीरू भाई अम्बानी

धीरू भाई अम्बानी
धीरू भाई अम्बानी एक स्कूल अध्यापक के दूसरे पुत्र धीरू अम्बानी का जन्म गुजरात के चरवाद गांव मैं हुआ था । उन्होंने दशवी के बाद पढाई छोड़ दी अपने बड़े भाई रामणिक लाल के पास एडेन चले गए । धीरू भाई ने वंहा  पेट्रोल पम्प पे नौकरी की। आठ वर्ष एडेन मैं बिताने के बाद , धीरू भाई मुंबई आगये । धीरूभाई ने मुंबई मैं एक निम्न माध्यम स्तरीय परिवार की तरह अपनी ज़िन्दगी शुरू की । जब वह मुंबई आये उस समय उनके पास मात्र... Read More
धीरू भाई अम्बानी एक स्कूल अध्यापक के दूसरे पुत्र धीरू अम्बानी का जन्म गुजरात के चरवाद गांव मैं हुआ था । उन्होंने दशवी के बाद पढाई छोड़ दी अपने बड़े भाई रामणिक लाल के पास एडेन चले गए । धीरू भाई ने वंहा  पेट्रोल पम्प पे नौकरी की। आठ वर्ष एडेन मैं बिताने के बाद , धीरू भाई मुंबई आगये । धीरूभाई ने मुंबई मैं एक निम्न माध्यम स्तरीय परिवार की तरह अपनी ज़िन्दगी शुरू की । जब वह मुंबई आये उस समय उनके पास मात्र ५० रुपया थे । उनका परिवार एक कमरे के पोरशन मैं जयहिंद एस्टेट भुलेश्वर मैं रहता था । वर्ष १९५८ मैं उन्होंने एक छोटा सा ववसयये शुरू किया , जिसमे वे मसाले एवं कपडे इत्यादि बेचने का कार्य करते थे । आठ वर्ष तक यह कार्य करने के बाद धीरूभाई ने अपना पहला लक्ष्य हासिल किया , जब उन्होंने नरोदा (अहमदाबाद ) एक छोटी स्पिनिंग मिल खरीदी ,  बस उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ के नहीं देखा । वर्ष १९७७ मैं रिलायंस इंडस्ट्रीज का पहला सर्वजनिक निवेश जारी हुआ और देखते ही देखते रिलायंस का कारोबार ७५० करोड़ तक पहुंच गया । वर्ष २००० मैं अख़बार के आंकड़ों के अनुसार रेलयांश की पूंजी ३०० करोड़ थी । धीरूभाई अम्बानी को देश के राजनितिक परिवर्तन से कई बार , समस्याओ का भी सामना करना पड़ा लकिन वे हर परिस्तिथि मैं आगे ही बढ़ते रहे । अपने शेयर धारको को उन्होंने , रिलायंस परिवार का नाम दिया एवं रिलायंस का शेयर धारक, रिलायंस की प्रगति के साथ साथ लाभिनवंत हुआ
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[email protected] 05 Oct 2019 1538 Views

हेनरी फोर्ड

हेनरी फोर्ड
  वर्ष १८६३ मैं हेनरी फोर्ड को बचपन से मशीनों एवं औजारों को ठीक करने मैं रूचि थी। १६ वर्ष की उम्र मैं ही उन्होंने घर छोड़ कर एक कंपनी मैं अप्रेंटिस का काम शुरू कर दिया । धीरे  धीरे वे स्टीम इंजीने सुधरने काम करने लगे ।  फिर उन्होंने एक आरा मशीन लगाई एवं अपना जीवनयापन करने लगे । वर्ष १८९१ मैं ड्रेट्रॉएट मैं एक कंपनी मैं इंजीनियर एवं १८९३ मैं चीफ इंजीनियर के पद पर पदोन्नत हुए । वर्ष १८९६ मैं उन्होंने... Read More
  वर्ष १८६३ मैं हेनरी फोर्ड को बचपन से मशीनों एवं औजारों को ठीक करने मैं रूचि थी। १६ वर्ष की उम्र मैं ही उन्होंने घर छोड़ कर एक कंपनी मैं अप्रेंटिस का काम शुरू कर दिया । धीरे  धीरे वे स्टीम इंजीने सुधरने काम करने लगे ।  फिर उन्होंने एक आरा मशीन लगाई एवं अपना जीवनयापन करने लगे । वर्ष १८९१ मैं ड्रेट्रॉएट मैं एक कंपनी मैं इंजीनियर एवं १८९३ मैं चीफ इंजीनियर के पद पर पदोन्नत हुए । वर्ष १८९६ मैं उन्होंने एक स्वयं चलित विहिकल बनाने मैं कामयाबी मिली। चार पहियों की यह साइकिल , उनके द्वारा बनाई पहली स्व-चलित साइकिल थी। कई बार असफलता का स्वाद चखने के बाद फोर्ड ने वर्ष १९०३ मैं अपनी कंपनी शुरू की एवं कार निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया।फोर्ड का सपना था, एक ऐसे कार का निर्माण करना, जिसका उपयोग आम आदमी कर सके एवं जिसका उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जा सके ।
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[email protected] 05 Oct 2019 1059 Views

डॉ विजयपथ सिंघानिया

डॉ विजयपथ सिंघानिया
डॉ विजयपथ सिंघानिया  आश्मान छूने का जज्बा हो  तो जमीन आपकी होती है  एक सफल व्यवसायी होने के साथ साथ साथ डॉ विजयपथ सिंघानिया ने एविएशन मैं दो विश्व रिकॉर्ड कायम किये है हल ही मैं हॉट एयर बेलून से ६९।852 फिट ऊंचाई का विश्व रिकॉर्ड रचने वाले डॉ सिंघानिया वर्ष १९९४ में आयोजित वर्ल्ड रेस मैं अपने सेना हवाई जहाज मैं बैठकर ३४० कलोमीटर की यात्रा २४ दिन मैं पूरी कर गोल्ड मैडल जीत चुके है ।  डॉ सिंघानिया को... Read More
डॉ विजयपथ सिंघानिया  आश्मान छूने का जज्बा हो  तो जमीन आपकी होती है  एक सफल व्यवसायी होने के साथ साथ साथ डॉ विजयपथ सिंघानिया ने एविएशन मैं दो विश्व रिकॉर्ड कायम किये है हल ही मैं हॉट एयर बेलून से ६९।852 फिट ऊंचाई का विश्व रिकॉर्ड रचने वाले डॉ सिंघानिया वर्ष १९९४ में आयोजित वर्ल्ड रेस मैं अपने सेना हवाई जहाज मैं बैठकर ३४० कलोमीटर की यात्रा २४ दिन मैं पूरी कर गोल्ड मैडल जीत चुके है ।  डॉ सिंघानिया को एविएशन मैं प्राप्त उपलब्धियों के लिए तत्कालीन राष्ट्रीयपति आर वेंकटरमन ने भारतीय वायु सेना मैं एयर कमांडर की रैंक देकर सम्मानित किया था।  वायु सेना की मीराज -२० लड़ाकू विमान वाली ग्वालियर स्थित ६ एयर इस्कवनदृण दुवारा बेटल अक्सस्क्वाइन  मैं शामिल होने का सम्मान पाने वाले वे पहले व् एकमात्र सिविलियन मेमबर है  एक बार तो कानपुर के लोगों को उन्होंने चौंका ही दिया। वर्ष 1988 की बात है। 12 सितंबर को कैंट के सिविल एयरपोर्ट पर माइक्रो लाइट एयरक्रॉफ्ट उतरा। पायलट सीट पर बैठा शख्स कोई और नहीं बल्कि कानपुर शहर के जाने माने शख्स विजयपत सिंहानिया थे। लंदन से कानपुर तक हजारों कि लोमीटर की दूरी उन्होंने अपना हवाई जहाज खुद चलाकर तय की थी। उनके स्वागत के लिए एयरपोर्ट के बाहर मेला लगा था। शहर के ज्यादातर लोगों को तब विजयपत बाबू के इस हुनर का पता चला था तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें तेनजिंग नोंग्गे नेशनल एडवेंचर अवार्ड से और ुपरस्त्रियपति भेरोसिंह शेखावत ने छत्रपति शिवजी महाराज स्मारक अवार्ड से सम्मानित किया ।  भारतीय सिविलियन एविएशन के जनक के नाम से परषिद जे आर दी टाटा से वे  वर्ष  १९८८ मैं  माइक्रोलाइट हवाई जहाज की यात्रा करने से पहले मिलने गए थे । उन्होंने ।जे ।आर। दी ।  टाटा से इस छोटे से विमान से इ इंग्लैंड से भारत आने के साहस के बारे मैं बात की । पहले तोह टाटा सोच मैं दुब गए और फिर एकदम से उछल कर उन्होंने कहा  कोण कहता ह की दुनिया मैं सिर्फ मैं ही पागल हूँ ? डॉ सिंघानिया ने फ्लाइंग के अलावा फिल्म जगमत मैं भी शोक आजमाया उन्होंने वोह त्येरा नाम था नाम की एक फिल्म का निर्माण किया उन्होंने साबित किया वे विजयपत सिंघानिया थे जिनका मंत्र है _ साहस ही कामयाबी की शुरुआत है  उम्र उन पर असर नहीं दिखति समृद्धि उन्हें नए जोखिम लेने से नहीं रोकती रोमांच उन्हें खींचता है ।  रिकॉर्ड तोड़कर मुझे विश्व को दिखाना था की भारत भी शाहषीक खेल और एविएशन मैं किसी से पीछे नहीं है । मुझे इस मिशन इम्पॉसिबल  को मिशन पॉसिबल मैं बदल कर भारत को एविएशन के नक़्शे पर रखना था। इससे पहले भी हॉट एयर बालून मैं कुछ अलग धुन सवार होने की वजह से इससे मैंने गंभीरतापूर्वक सोचा और यह जोखिम उठा लिया। सफलता की परिभाषा नहीं हो सकती । हरेक व्यक्ति की सफलता के बारे मैं अलग - अलग व्याख्या होती है । कोई लेखक एक किताब लिखकर खुश हो जाता है तोह कोई पेंटर पेंटिंग बनाकर कझूश होता है  चाहे वे पेंटिंग बेके या न बेके । उसके लिए पेंटिंग सूजन मैं मिली ख़ुशी ही उसकी सफलता है ।  सफलता को सिर्फ आर्थिक मापदंड से नहीं नपा जा सकता है । आप किसी चीज कोप पाने के लिए खूब मेहनत करते है और आपकी म्हणत  सफल हो जाती है, तोह वह सफलता हासिल करना मन लिया जाता है । लकिन ऐसा भी होता है की बड़ी म्हणत करने के बावजूद वह नहीं मिल पाती। ऐसे मैं उस मेहनत को नाकारा नहीं जा सकता है । असफलता मैं सफलता हरेक के लिए सापेक्ष शब्द है संतुस्ट उसका मूलभाव है है ।  जीवन के अनेक पहलू होते है । समाज, परिवार, करियर, फ्यूचर, संगीत, स्पोर्ट्स आदि मैं भी शामिल है । पैसा कामना ख़राब नहीं लकिन अप्प किस तरह पैसा कमा रहे ह उसका महत्व है अप्प मेहनत करके पैसा कमाए । गलत रस्ते या अपना ईमान बेचकर कमाया पैसा कभी भी ख़ुशी नहीं देता ।  अलग - अलग क्षेत्र  मैं रूचि विक्षित कर उसमे आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाइये । अपने मनपसंद क्षेत्र मैं सिद्धि हासिल करना ही सफलता है  उस तरह से सफलता नहीं मिलती तोह किसी कमको करने से यदि आपको ख़ुशी मिलती है तोह वह भी आपकी सफलता है । इसलिए सफलता सिर्फ पैसो से नहीं मिलती ।  मेरे मुताबिक पुराणी और नयी पीढ़ी के बिच मैं अंतर बढ़ता ही जा रहा है । उसके लिए आज का वैल्यू सिस्टम जिम्मेदार हैं । लोगो मैं ईमानदारी , प्राथमिकता की व्याख्या ही बदल गयी है। उनमें अनुशासन की कमी देखने को मिलती है । लोग मेहनत करने की बजाये shortcut  रास्ता अपना रहे है । नयी पिड्डी  को पुराणी  पीढ़ी  के अनुभवों का समन्वय करना चाहिए और पुराने पीढ़ी को आज की पीढ़ी की जरूरतों को  समझदरी से स्वीकार करना चाहिए । सबसे पहली बात जीवन मैं अनुशासन होना जरुरी है । आपका तन और मैं दोनों ही स्वस्थ होना चाहिए। शरीर स्वस्थ होगा तो दिमाग भी तेज चलेगा । आहार , विहार और विचार मैं संतुलन रखना बहुत जरुरी है । अज्ज के युवाओ को सिमित दायरे मैं नहीं सोचना चाइये । जिस  क्षेत्र मैं रूचि हो जैसे डॉक्टर बनने मैं, पेंटिंग, स्विमिंग, म्यूजिक, आदि उसके बारे मैं ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल करे । पैसा ख़तम  हो जाता है लकिन ज्ञान नहीं । yahi ज्ञान आपको पैसा  भी vapas भी ला देगा । जीवन सबसे जरुरी है । आप जो भी विषय चुनते है उसके बारे मैं दिल से महसूस करे । स्वस्थ मैं से चुनौती को स्वीकार करे । 
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[email protected] 03 Oct 2019 1309 Views

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