राजा के जूते
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बहुत समय पहले की बात है। एक था राजा और एक था उसका मंत्री। राजा का नाम था अमीरचंद और मंत्री का गरीबचद।
एक दिन अमीरचंद ने गरीबचंद से कहा, "सुनो, मंत्री जी! कल हम राज्य में घूमने निकले, तो हमारे पैरों में धूल लग गई। धूल की इतनी मजाल कि वह हमारे पैरों में लगे! तुम लोग मुफ्त का खाते हो, इस धूल का कुछ करो... नहीं, तो तुम्हारी खैर नहीं!
राजा की बात सुनकर गरीबचंद घबरा गया और थर-थर काँपने लगा। वह हाथ जोड़कर बोला, "महाराज, आप हमारे अन्नदाता हैं! अगर आपके चरणों पर धूल नहीं लगेगी, तो हम लोगों को आपकी चरण-धूलि कैसे मिलेगी!"
गरीबचंद की बात सुनकर राजा खुश हो गया, फिर भी कुछ अकड़कर बोला, "जो भी हो, हमें धूल से नफ़रत हो गई है। तुम इसे पूरे राज्य से हटवा दो, नहीं तो तुम्हारे लिए बहुत बुरा होगा!" राजा का ऐसा आदेश सुनकर गरीबचंद की आँखों के आगे अँधेरा छा गया। उसने देश-विदेश के सभी विद्वानों से धूल हटाने का उपाय पूछा, लेकिन कोई भी उसे सही उपाय नहीं बता पाया। लाचार गरीबचंद ने राजा को खुश करने के लिए एक अनोखा उपाय सोचा। उसने कई लाख झाडू खरीदे और उन्हें राज्य की सारी प्रजा में बँटवा दिया। राजा के आदेश का पालन करने के उद्देश्य से राज्य के सभी लोग गलियों-मुहल्लों में झाडू लगाने लगे। इससे इतनी धूल उड़ी कि सूर्य का प्रकाश भी मंद पड़ गया और राजा खाँसते-खाँसते बहुत परेशान हो गया।
राजा ने गरीबचंद को बुलाया और कहा, "मंत्री जी. तुम्हारी व्यवस्था तो बहुत ही बेकार है। धूल हटाने के चक्कर में चारों ओर धूल-ही-धूल कर दी! अगर दो दिनों में धूल नहीं हटी, तो तुम्हें जेल की हवा खानी पड़ेगी!"
राजा की बात सुनकर गरीबचंद सिर पर पाँव रखकर भागा। उसने हज़ारों भिश्तियों को धूल पर पानी छिड़कने की आज्ञा दी। छिड़काव में इतना पानी खर्च हो गया कि कुओं और तालाबों का सारा पानी खत्म हो गया और चारों ओर कीचड़-ही-कीचड़ हो गया, वह अलग! राज्य के लोग प्यास के मारे मरने लगे। राजा ने गरीबचंद को एक बार फिर डाँटा, "तुमने तो हमें बरबाद कर दिया! तुम जैसों को तो सूली पर चढ़ा देना चाहिए। सारे राज्य में यह क्या कीचड़ कीचड़ कर रखा है?"
घबराए गरीबचंद ने तुरंत योग्य मंत्रियों की एक बैठक बुलाई। मंत्रियों ने गरीबचंद को यह सलाह दी कि अगर राज्य की पूरी धरती को चमडे से मढ दिया जाए, तो धूल से बचा जा सकता है। गरीबचंद ने यह सलाह राजा को बताई। राजा को यह बात ठीक लगी और उसने देश के सभी चर्मकारों को बुलवाया।
चर्मकारों को जब पता चला कि उन्हें सारे राज्य की धरती को मढ़ना है. तो वे बुरी तरह घबरा गए और राजा से बोले, "महाराज, न तो हमारे पास इतना चमड़ा है और न ही इतनी शक्ति कि हम पूरे राज्य की धरती को मढ़ सकें!" तभी एक बूढ़ा चर्मकार बोला, "महाराज, मैं एक उपाय बताऊँ ! "
राजा बोला, "तुम क्या बताओगे? विद्वानों की पूरी सभा तो इसका हल बता नहीं पाई... तुम आए हो!" बूढ़ा चर्मकार बोला, "आप आज्ञा तो कीजिए!"
राजा ने उसकी बात मान ली। बूढ़े चर्मकार ने अपने झोले में से मुलायम चमड़े का एक टुकड़ा निकाला और उससे एक जोड़ा सुंदर-सा जूता बनाकर राजा के पाँवों में डाल दिया। अब वह राजा से थोड़ा चलने की प्रार्थना करने लगा।
जूते पहनकर राजा ने कुछ दूर तक चलकर देखा। उसके पैरों में धूल का एक कण भी नहीं लगा।
बूढ़े चर्मकार द्वारा अपनाए गए उपाय से गरीबचंद की जान बच गई और उसी दिन से लोगों ने जूते पहनने प्रारंभ कर दिए।
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