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Blog by partiksha | Digital Diary

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महाराणा प्रताप


          महाराणा प्रताप  त्याग, बलिदान, निरन्तर संघर्ष और संविधीनता के रक्षक के रूप में देशवासी महाराणा प्रताप को याद करते हैं। Read More

          महाराणा प्रताप 

त्याग, बलिदान, निरन्तर संघर्ष और संविधीनता के रक्षक के रूप में देशवासी महाराणा प्रताप को याद करते हैं।


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श्री रामचंद्र


            श्री रामचंद्र  श्री रामचंद्र जी के कार्य श्रेष्ठ और लोक कल्याणकारी थे। उनके व्यक्तित्व उच्च मानवीय गुणों से संपन्न था। राम अयोध्या निरीक्षा दशरथ के सबसे बड़े पुत्र थे। राम गुरुजनों की आज्ञा का पालन निष्ठा पूर्वक करते थे। पिता की आज्ञा से राम ने अपने छोट भाई लक्ष्मण के साथ ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में जाकर उनके यज्ञ को हानि पहुंचाने वाले राक्षसों... Read More

            श्री रामचंद्र 

श्री रामचंद्र जी के कार्य श्रेष्ठ और लोक कल्याणकारी थे। उनके व्यक्तित्व उच्च मानवीय गुणों से संपन्न था। राम अयोध्या निरीक्षा दशरथ के सबसे बड़े पुत्र थे। राम गुरुजनों की आज्ञा का पालन निष्ठा पूर्वक करते थे। पिता की आज्ञा से राम ने अपने छोट भाई लक्ष्मण के साथ ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में जाकर उनके यज्ञ को हानि पहुंचाने वाले राक्षसों का वध किया। यहीं से ये सीता जी के स्वयंवर में गए। वहां शिव जी का धनुष तोड़ने के पश्चात सीता जी के साथ श्री राम का विवाह हुआ।

जब राजा दशरथ वृद्ध हो चली, तब उन्होंने राम को शासन का भार सपना चाहा। परंतु मथुरा दासी के बहकावे मैं आकर कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वरदान मांगे। यह वर्ड दशरथ ने देवासुर संग्राम में कैकेयी के असीम शौर्य और सहायता से प्रसन्न होकर उसे मांगने को कहा था। कैकेयी ने भविष्य में कभी मांगने की बात कही थी। पहले वरदान मैं उसने भारत को राजगद्दी देने को कहा। और दूसरे वरदान में राम को 14 वर्ष का वनवास मांगा।


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मंगल पांडे


            मंगल पांडे  मंगल पांडे प्रथम स्वाधीनता संग्राम की प्रथम देशभक्ति सिपाही थें। उनका जन्म साधारण परिवार में हुआ। मंगल पांडे शांत और सरल स्वभाव के थे। 10 मई, 1849 ई० को यह ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारती हो गए। एक दिन बंगाल छावनी में बंदूक के कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी लगे होने की बात फैली, जिससे सिपाहियों में असंतोष फैल गया। उसी रात बै... Read More

            मंगल पांडे 

मंगल पांडे प्रथम स्वाधीनता संग्राम की प्रथम देशभक्ति सिपाही थें। उनका जन्म साधारण परिवार में हुआ। मंगल पांडे शांत और सरल स्वभाव के थे। 10 मई, 1849 ई० को यह ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारती हो गए। एक दिन बंगाल छावनी में बंदूक के कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी लगे होने की बात फैली, जिससे सिपाहियों में असंतोष फैल गया। उसी रात बैरकपुर छावनी में कुछ इमारतें में आग की लपटें देखी गई। आग लगने वाले का पता न चला। 

तिरुपुर को 19 नवंबर पलटन ने कारतूस प्रयोग करने से इनकार कर दिया। पलटन से हथियार रखवा लिए गए और सैनिकों को बर्खास्त कर दिया गया। 29 मार्च 1857 को मंगल पांडे ने खुले रूप में क्रांति का आह्वान किया। मंगल पांडे ने मेजर हयूसन और लेफ्टिनेंट बाघ को घोड़े सहित गोली मार दी। बैग बच गया तो उसे मंगल पांडे ने उसे तलवार से मार दिया। घायल अवस्था में मंगल पांडे को गिरफ्तार किया गया। 8 अप्रैल 1857 ई० को पुरी रेजीमेंट के सामने मंगल पांडे को फांसी दे दी गई।


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आईए एकलव्य के बारे में जाने।


              एकलव्य एकलव्य हस्तिनापुर के निकट वन के पास बस्ती के सरदार हिरण्यधेनु का पुत्र था तीर चलाने मैं हस्तिनापुर के आसपास एकलव्य की बराबरी करने वाला कोई नहीं था। एकलव्य और अधिक निपुणता प्राप्त करने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास गया। द्रोणाचार्य बाण विद्या के अद्वितीय आचार्य थे। उन्होंने तीर चला कर किसी राजकुमार की अंगूठी को कुवैत से बाहर निकाल दिया थ... Read More

              एकलव्य

एकलव्य हस्तिनापुर के निकट वन के पास बस्ती के सरदार हिरण्यधेनु का पुत्र था तीर चलाने मैं हस्तिनापुर के आसपास एकलव्य की बराबरी करने वाला कोई नहीं था। एकलव्य और अधिक निपुणता प्राप्त करने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास गया। द्रोणाचार्य बाण विद्या के अद्वितीय आचार्य थे। उन्होंने तीर चला कर किसी राजकुमार की अंगूठी को कुवैत से बाहर निकाल दिया था। हस्तिनापुर आकर रंगभूमि में दोपहर के समय एकलव्य ने राजकुमारों को अभ्यास करते हुए और बाण चलते हुए देखा।

अर्जुन को देखकर एकलव्य ने मुख से वाह वाह शब्द निकाले। सब राजकुमारों का एकलव्य की तरफ ध्यान आकृष्ट हुआ। आचार्य ने उसे संकेत से बुलाया। एकलव्य ने चरण छूकर प्रणाम किया। आचार्य के आदेश से उसने तीर चलाकर और सही निशान लगाकर सबको चकित कर दिया। उसने द्रोणाचार्य से अभिलाषा की कि आप मुझे बाद विद्या सिखा दो। द्रोणाचार्य वहां से निराश होकर चल पड़े। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मूर्ति बनकर पूजा करनी शुरू कर दी। अर्जुन बहुत किंग थे क्योंकि वे समझते थे कि मेरे समान बाण चलने वाला कोई नहीं है। द्रोणाचार्य ने एकलव्य से कहा मुझे वचन दो की मैं तमसे जो मांगूंगा वह तुम्हें देना होगा। जी गुरु द्रोणाचार्य ने कहा मुझे तुम्हारे दाएं हाथ का अंगूठा चाहिए। एकलव्य ने अपना दाएं हाथ का अंगूठा काट कर गुरुजी को दे दिया। द्रोणाचार्य उसकी कला और गुरु भक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हुए।


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महात्मा बुद्ध


             महात्मा बुद्ध  महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। ये कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के पुत्र थे। सिद्धार्थ तिक्ष्ण बुद्धि के थे। यह जिज्ञासु स्वभाव के थे। उनके विषय में विद्वानों ने घोषणा की थी की एक दिन घर बार त्याग कर सन्यासी हो जाएंगे। पिता नहीं चहाते थे पुत्र सन्यासी हो, अतः उन्होंने उनका विवाह यशोधरा के साथ कर दिया। यशोधरा को एक पु... Read More

             महात्मा बुद्ध 

महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। ये कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के पुत्र थे। सिद्धार्थ तिक्ष्ण बुद्धि के थे। यह जिज्ञासु स्वभाव के थे। उनके विषय में विद्वानों ने घोषणा की थी की एक दिन घर बार त्याग कर सन्यासी हो जाएंगे। पिता नहीं चहाते थे पुत्र सन्यासी हो, अतः उन्होंने उनका विवाह यशोधरा के साथ कर दिया। यशोधरा को एक पुत्र हुआ। पुत्र का नाम राहुल रखा गया। सिद्धार्थ का मन परिवार और राज्यकार्य मैं नहीं लगता था। एक दिन सिद्धार्थ नगर भ्रमण के लिए जा रहे थे। इन्होंने एक वृद्ध को देखा।

जो बहुत मुश्किल से चल पा रहा था। इस संबंध में सारथी से पूछने पर ज्ञात हुआ कि एक दिन सभी की यही दशा होती है। एक दिन इन्होंने देखा की चार व्यक्ति एक मृतक को लिए जा रहे हैं। सारथी से पूछने पर ज्ञात हुआ कि यह सभी को मारना पड़ेगा। तभी सिद्धार्थ ने इस संसार के माया मोह को छोड़ने का निश्चय कर लिया। और एक दिन वे अपनी सुंदर पत्नी और पुत्र को छोड़  यात्री मैं ही घर से निकल गए। सन्यासी भक्ति सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में घूमते रहे। कुछ दिनों बाद यह गया पहुंचे और ज्ञान प्राप्ति का संकल्प लेकर एक वोट वृक्ष के नीचे बैठ गए। 6 वर्ष की कठिन तपस्या के बाद इन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया। तब यह गौतम बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए।


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गुरु नानक देव।


        गुरु नानक देव गुरु नानक देव के परम उपासक थे। बचपन से ही यह धर्म और ईश्वर संबंधी बातों में रूचि रखते थे। जहां ये साथियों के साथ भजन कीर्तन में मस्त रहते थे। वही पाठशाला में गुमसुम रहते थे। पिता इन्हें बीमार जानकर इलाज का उपाय खोजने लगे। वैध द्वारा नाड़ी देखने से रोग नहीं जाना जा सका, धीरे-धीरे नानकदेव के ज्ञान, सत्संग और भजन आदि गुणों की चर्चा होने लगी। नानक को व्या... Read More

        गुरु नानक देव

गुरु नानक देव के परम उपासक थे। बचपन से ही यह धर्म और ईश्वर संबंधी बातों में रूचि रखते थे। जहां ये साथियों के साथ भजन कीर्तन में मस्त रहते थे। वही पाठशाला में गुमसुम रहते थे। पिता इन्हें बीमार जानकर इलाज का उपाय खोजने लगे। वैध द्वारा नाड़ी देखने से रोग नहीं जाना जा सका, धीरे-धीरे नानकदेव के ज्ञान, सत्संग और भजन आदि गुणों की चर्चा होने लगी। नानक को व्यापार के लिए सुल्तानपुर भेजा गया।

वहां भी कार्य के साथ साथ, दोनों को मुक्ति भोजन करना, साधु संगति करना और ईश्वर भजन करना उनकी दिनचर्या में सम्मिलित था। सुरक्षिणा देवी से इनका विवाह होने पर श्री चंद कॉल लक्ष्मीचंद और दो पुत्र पैदा हुए। फिर भी नानक का मन परिवार मैं नहीं लगा। पिता ने नानक की देखभाल के लिए मरदाना को भेजा। वह नानक का भक्त बन गया। आज भी मानवता के उपासक नानक देव की खासियत विश्व में गूंज रही है।


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अशोक महान के बारे में जाने


           अशोक महान अशोक महान का नाम भारत के इतिहास में दयालुता और करुणा के लिए विशेष प्रसिद्ध है। अशोक कलिंग पर विजय प्राप्त कर उसे अपने अधीन कर लिया। इस युद्ध में लगभग 100000 लोग मारे गए। अशोक ने मारे गए सिपहिया, रोटी बलखाती स्त्रियों तथा बच्चों को दिखा। इन सबको देखकर उसका हृदय द्रवित हो गया तब उसने निर्णय किया कि अब मैं तलवार नहीं उठाऊंगा। अशोक पंजा को अपनी संतान... Read More

           अशोक महान

अशोक महान का नाम भारत के इतिहास में दयालुता और करुणा के लिए विशेष प्रसिद्ध है। अशोक कलिंग पर विजय प्राप्त कर उसे अपने अधीन कर लिया। इस युद्ध में लगभग 100000 लोग मारे गए। अशोक ने मारे गए सिपहिया, रोटी बलखाती स्त्रियों तथा बच्चों को दिखा। इन सबको देखकर उसका हृदय द्रवित हो गया तब उसने निर्णय किया कि अब मैं तलवार नहीं उठाऊंगा।

अशोक पंजा को अपनी संतान के सम्मान समझता था। वह दीन दुखियों, अपाहिजों का ध्यान रखता था। सभी उनके राज्य के अधिकारों का आदेश दे रहा था। अशोक बुद्ध धर्म का अनुयाई था। किंतु सभी धर्म का आदर करता था। वह दियालुता कहां व्यवहार करता था।


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ईश्वर चंद्र विद्यासागर।


      ईश्वर चंद्र विद्यासागर  ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म 16 सितंबर 1820 ई को बंगाल वीर सिंह नामक ग्राम में हुआ था। इनकी माता का नाम भगवती देवी तथा पिता का नाम ठाकुरदास बंधोपाध्याय था। सभी का सम्मान करने, अपना कार्य स्वयं करना, शिक्षा इन्हें अपनी मां से मिली। गांव में प्रारंभिक शिक्षा के बाद यह उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता संस्कृत विद्यालय गए। जब विद्यासागर स्कूल ऑन की सहायक न... Read More

      ईश्वर चंद्र विद्यासागर 

ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म 16 सितंबर 1820 ई को बंगाल वीर सिंह नामक ग्राम में हुआ था। इनकी माता का नाम भगवती देवी तथा पिता का नाम ठाकुरदास बंधोपाध्याय था। सभी का सम्मान करने, अपना कार्य स्वयं करना, शिक्षा इन्हें अपनी मां से मिली। गांव में प्रारंभिक शिक्षा के बाद यह उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता संस्कृत विद्यालय गए।

जब विद्यासागर स्कूल ऑन की सहायक निदेशक युक्त हुए। तब इन्होंने शिक्षा मैं अनेक सुधार किया।इन्होंने 35 ऐसे स्कूल खोले जो बालिकाओं की शिक्षा का प्रबंध था।


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पंडित जवाहरलाल नेहरू


     पं. पंडित नहरू 14 नवंबर को जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है, पंडित नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 ई. को प्रयाग, इलाहाबाद में हुआ था। इनमें से एक पिता मोतीलाल नेहरू प्रसिद्ध वकील थे। माता स्वरूप रानी उदार महिला थी। नेहरू जी की आरंभिक शिक्षा घर में ही हुई। विलायत से वकालत की शिक्षा पूरी कर इलाहाबाद में इन्होंने वकालत शुरू कर दी। इस समय उनकी भेंट गांधीजी से हुई। वकालत छोड़कर... Read More

     पं. पंडित नहरू

14 नवंबर को जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है, पंडित नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 ई. को प्रयाग, इलाहाबाद में हुआ था। इनमें से एक पिता मोतीलाल नेहरू प्रसिद्ध वकील थे। माता स्वरूप रानी उदार महिला थी। नेहरू जी की आरंभिक शिक्षा घर में ही हुई। विलायत से वकालत की शिक्षा पूरी कर इलाहाबाद में इन्होंने वकालत शुरू कर दी। इस समय उनकी भेंट गांधीजी से हुई। वकालत छोड़कर ये स्वाधीनता संग्राम में देश को आजाद कराने के लिए सक्रिय हो गए।

सन 1919 ईस्वी में जलियांवाला बाग कांड से देश में क्रोध की ज्वाला धधक उठी। सन 1920 ईस्वी में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया। सन 1921 ईस्वी में प्रिंस ऑफ वैक्स भारत आए। उनके स्वागत का बहिष्वर वनकिया गया। इलाहाबाद में विरोध का नेहरू जी ने किया। यह पहली बार अपने पिता के साथ जेल गए। 27 में 1964 ई को इनका निधन हो गया।

 


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लाल बहादुर शास्त्री।


      लाल बहादुर शास्त्री  लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर सन 1904 को मुगलसराय (तत्कालीन वाराणसी वर्तमान चंदौली) के एक साधारण परिवार में हुआ था। इसके पिता का नाम शारदा प्रसाद और माता का नाम रामदुलारी देवी था। अपनी शिक्षा पूरी कर लाल बहादुर वाराणसी आ गए। पढ़ने-लिखने विशेष रुचि थी। वे बहुत ही सीधे-सीधे शांत और सरल स्वभाव के विद्यार्थी थे। जब लाल बहादुर बनारस के हरिश्चंद्र ह... Read More

      लाल बहादुर शास्त्री 

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर सन 1904 को मुगलसराय (तत्कालीन वाराणसी वर्तमान चंदौली) के एक साधारण परिवार में हुआ था। इसके पिता का नाम शारदा प्रसाद और माता का नाम रामदुलारी देवी था। अपनी शिक्षा पूरी कर लाल बहादुर वाराणसी आ गए। पढ़ने-लिखने विशेष रुचि थी। वे बहुत ही सीधे-सीधे शांत और सरल स्वभाव के विद्यार्थी थे। जब लाल बहादुर बनारस के हरिश्चंद्र हाई स्कूल में पढ़ रहे थे उसे समय लोकमान्य बालगंगाधर तिलक क नारा "स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।"

पूरे देश में गूंज रहा था। इससे उसे देश देश प्रेम की प्रेरणा मिली। उसके भाषण से वह बहुत प्रभावित हुए। अब मैं पढ़ाई के साथ-साथ स्वराज आंदोलन में भी भाग लेने लगे। गांधी जी का असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ। लाल बहादुर भी पढ़ाई छोड़कर आंदोलन में कूद पड़े। आजादी की लड़ाई में उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। बाद मैं लाल बहादुर काशी विद्यापीठ में शिक्षागहण करने लगे। सन 1926 में उन्होंने शास्त्री की परीक्षा पास की। अब वे लाल बहादुर से लाल बहादुर शास्त्री बन गए। 10 जनवरी सन 1966 की ह्रदय गति रुक जाने से ताशकंद में ही उनका निधन हो गया।

 


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