भारत में न्याय की परंपरागत प्रणाली मुख्य रूप से प्रचलित कानून पर आधारित थी अनेक कानून शास्त्रों और शरण तथा सही फरमानों पर आधारित थे शुरू में अंग्रेज आमतौर से प्रचलित कानून ही लागू करते रहे लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने कानून की एक नई प्रणाली विकसित की तत्कालीन कानून को साहित्य वृद्धि किया गया इसका अर्थ था कि शासन कानून के अनुसार चलाया जाएगा ना कि शासन की इच्छा के अनुसार
अब कानून की निगाह में सारे मनुष्य बराबर है जाति धर्म या वर्ग के आधार पर बिना भेदभाव के एक ही कानून सब लोगों पर लागू होता था पहले की न्याय प्रणाली जाति के भेदभाव का ख्याल करती थी जैसे यदि किसी ऊंची जाति के व्यक्ति ने कोई अपराध किया तो उसकी सजा किसी और जाति के व्यक्ति से भिन्न होती थी
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