लगभग 150 वर्षों में अंग्रेज शासको ने सभी भारतीय संस्थानों में राजनीतिक धार्मिक सामाजिक न्यायालय दखल दिया इससे भारत में प्रभुत्व वर्ग वालों को सीधे ठेस पहुंची और शासन एवं जनता के बीच संदेह का माहौल बन गया
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