दा शहनाई ऑफ़ बिस्मिल्लाह खान

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दा शहनाई ऑफ़ बिस्मिल्लाह खान

सम्रा औरंगजेब दे राज दिवस में पुंगी नमक वाद्य यंत्र बजाना प्रतिबंधित कर दिया क्योंकि इसकी आवाज अच्छी वह वृक्ष थी पुगी दरकत से बने शोर मचाने वाले सभी का सामान्य नाम पड़ गया शायद ही किसी ने सोचा होगा किया है एक दिन उधर जीवित हो जाएगी पेशेवर संगीतकारों के एक दी जिसकी राजमहल तक पहुंच थ्री डे पुंगी लंबा वह छोड़ा था और पाइप के शरीर में साथ छेड़ कर दिए जब उसने इसमें से कुछ शब्दों को बंद करके तथा खोलकर इसे बजाय तो कुबल में मधुर धनिया उत्पन्न हुई उसने राज परिवार के सदस्य के सामने वाद्य यंत्र को बजाय और इसे हर कोई प्रभावित हुआ पुंगी से एकदम भेद इस बगेंद्र को एक नया नाम दे रहा था जैसे की कथा कहीं जाती है क्योंकि यह पहली बार सब के कक्षा में बजाई गई थी तथा एक नई के द्वारा बजाई गई थी इस बगेंद्र को शहनाई नाम दिया गया 

 शहनाई की आवाज को शुभ माना जाना लगा तथा इसी कारण से इसे आज भी मंदिरों में बचाया जाता है और यह किसी भी उत्तर भारतीय विभाग का अनिवार्य अंग है अतीत में शहनाई डोबेट या राज दरबारों में पाए जाने वाले दो परंपरागत बगेंद्र समूह का अंग थी हाल ही तक इसका प्रयोग केवल मंदिरों में विवाहों में होता था इस वाद्य यंत्र को शास्त्रीय बचपन पर लाने का से उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को जाता है

 5 वर्ष की अवस्था में बिहार में डूब राव के प्राचीन इलाके में तालाब के पास बिस्मिल्लाह खान दिल्ली दादा खेलने करते थे वह नियमित रूप से निकट के ब्याह है जी के मंदिर में भोजपुरी चेता गाने जाया करते थे जिनकी समाप्ति पर उन्हें एक पॉइंट 25 किलोग्राम का बड़ा लड्डू मिलता था जो उन्हें स्थानीय महाराज द्वारा पुरस्कार में दिया जाता था यह 80 वर्ष पुरानी बात है और यह छोटा बालक भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न प्राप्त करने के लिए दूर-दूर की यात्रा कर चुका है

 21 मार्च 1916 को जन्मे बिस्मिल्लाह खान बिहार के एक संगीत्रों के सुविचार परिवार में आते है उनके दादा रसूल बख्श खान भोजपुरी के राजा के दरबार के शहनाई वाज थी उनके पिता पैगंबर बख्श तथा पिता के पक्ष के दूसरे पूर्वाझा भी वहां शहनाई वादक थे

 छोटे बालक ने प्रारंभिक जीवन में ही संगीत में रुचि लेना प्रारंभ कर दिया था 3 वर्ष के अवस्था में जब उनकी माताजी उन्हें उनके बाबा जी के घर पर बनारस अब वाराणसी ले गई तो बिस्मिल्लाह खान अपने बाबो को शहनाई का आरंभ करते देखकर मुग्ध हो गए शीघ्र ही बिस्मिल्लाह दे अपने मामा अली बक्स के साथ बनारस के विष्णु मंदिर जाना प्रारंभ कर दिया जहां वक्त शहनाई वादन के लिए नियुक्त थे अली बक्स शहनाई बजाय करते थे और बिस्मिल्लाह करो तक लगातार मुक्त बैठे रहते थे धीरे-धीरे उन्होंने वाद्य यंत्र बजाने में पाठ देना प्रारंभ कर दिया और वह पूरे दिन बैठे आरंभ किया करते थे आने वाले वर्षों में बालाजी और मंगल मैया के मंदिर और गंगा के किनारे युवा प्रशिक्षण के प्रिया स्थान बन गए जहां वह एकांत में अभ्यास कर सकता था गंगा के बहते जल ने उन्हें नए रगों में एकांक परिवर्तन करने तथा नवीन राघव की रचना करने की ने पहले शहनाई की सीमा से परे माना जाता था की प्रेरणा दी 

 14 वर्ष की अवस्था में बिस्मिल्लाह अपने पिता के साथ इलाहाबाद संगीत सम्मेलन में गए उनकी संगीत प्रस्तुति के अंत में उस्ताद फायदा खान ने युवा लड़के की पीठ थपथपाई और कहां मेहनत करो और तुम आवश्यक कर पाओगे लखनऊ में 1938 में ऑल इंडिया रेडियो के प्रारंभ के साथ ही बिस्मिल्लाह को बड़ा स अक्षर प्राप्त हुआ वह शीघ्र ही रेडियो पर बहुत सुने जाने वाले शहनाई वादक बन गए

 जब भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त हुई तो बिस्मिल्लाह खान राष्ट्र को अपनी शहनाई से राष्ट्र का अभिवादन करने वाले प्रथम भारतीय बने इन्होंने लाल किले श्रोतागण के सम्मुख जिम पंडित जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे राग काफी में अपनी आत्मा उदल दी जिन्होंने नेहरू ने बाद में अपना प्रसिद्ध भाषण ट्रस्ट विद डिसीजन दिया 

 धन्यवाद-




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