वास्तव में गृह व्यवस्था में कार्य व्यवस्था के अतिरिक्त अर्थव्यवस्था भी शामिल होती है यहां पर अर्थव्यवस्था से तात्पर्य ग्रह की अर्थ अथवा धन संबंधी व्यवस्था है अर्थात ग्रह के आए हुए को व्यवस्थित करना ही ग्रह की अर्थव्यवस्था है ग्रहणी को परिवार की आए और वे में संतुलन स्थापित करके परिवार की अधिकार अधिक आवश्यकताओं को संतुष्ट करना होता है निखिल तथा डारसी के अनुसार परिवार की आय तथा वह पर नियंत्रण होना तथा आए को ग्रह के संजना आत्मक कार्यों में व्यय करना गृह अर्थव्यवस्था कहलाती है
अर्थव्यवस्था का महत्व:-
परिवार का जीवन स्तर सुख समृद्धि परिवार की अर्थव्यवस्था पर निर्भर होता है गृहणी का यह उत्तरदायित्व होता है कि वह परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकता को बुद्धिमत्ता पूर्ण तरीके से पूरी कर उसे संतुष्टि प्रदान करें साथ ही हमारी जितनी आए हो उसी में आवश्यकता है पूरी होनी चाहिए अर्थव्यवस्था का महत्व निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है
परिवार में आए का स्रोत मुख्यतः मुख्य होता है अतः उसकी भूमिका बहुत उपयोगी होती है
अर्थव्यवस्था एक प्रक्रिया है जिसमें आई का नियोजन नियंत्रण तथा मूल्यांकन होता है परिवार के अर्थव्यवस्था चलाने के लिए कुशलता बुद्धिमता की आवश्यकता होती है
यह को एक योजना बनाकर किया जाए तथा समय-समय पर आए को आवश्यकताओं के अनुसार बढ़ाना चाहिए
अर्थव्यवस्था की विधियां :-
निखिल तथा डारसी के अनुसार अर्थव्यवस्था की पांच विधियां है इन पांच वीडियो के द्वारा ही प्रत्येक परिवार अपने लिए की योजना बनाता है यह विद्या निम्नलिखित है-
परिवार वित्त विधि - परिवार की आय के अनुसार बजट बनाया जाता है इसका संचालन परिवार का मुखिया करता है
भता विधि - इसमें मुखिया अपनी आय का आवश्यक भाग घर के सदस्यों में व्यक्तिगत या सामूहिक रूप में व्यय करता है और शेष धन अपने पास रखता है जो भविष्य की योजनाओं के लिए होता है
समान वेतन विधि - इसमें घर के कई सदस्य अपनी आवश्यकता अनुसार धन खर्च करते हैं और शेष धन अपने-अपने नियंत्रण में रखते हैं यह उन परिवारों में लागू होता है जहां पर घर के कई सदस्य धन कमाते हैं
आदर्श विधि - इस विधि में परिवार की आय को दो भागों में व्यक्त किया जाता है एक भाग में घर का खर्च होता है तथा दूसरे भाग का धन बैंक में जमा कर दिया जाता है जहां पर पति-पत्नी दोनों कमाते हैं वहां पर इसी प्रकार का भी होता है
आशिक विधि- इस विधि में घर के सभी सदस्य की आय का धन परिवार के मुखिया के पास जमा होता है एवं उसी का इस पर नियंत्रण होता है शेष बचा धन भी मुखिया के नाम से ही संचित होता है तथा आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग किया जाता है यह विधि संयुक्त प्रणाली वाले परिवारों में अधिक अपनाई जाती है
अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले कारक
परिवार के सदस्यों की संख्या - अधिक सदस्य संख्या वाले परिवार में अधिक हुए होता है तथा कम सदस्य वाले संख्या में परिवार में काम हुए होता है फल स्वरुप दोनों प्रकार के परिवारों के रहन-सहन का स्तर अलग-अलग होता है अतः अर्थव्यवस्था को परिवार की सदस्य संख्या प्रभावित करती है
मुखिया की स्थिति- जिस परिवार के मुखिया की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है वहां पर अर्थव्यवस्था भी अच्छी होती है मुखिया की आई अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है
परिवार वे का नियोजन- वे की योजना बना लेने से वह करने में आसानी रहती है और आवश्यक भी एक नहीं होने पता ऐसा होने से अर्थव्यवस्था उत्तम रहती है
सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तनों का प्रभाव- वैज्ञानिक युग होने के कारण सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तन होते हैं इसका प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ता है अधिक फैशन वाली वस्तुओं उपकरणों आदि को खरीदने से अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है अतः आए देखकर ही व्यय करना चाहिए
जीवन स्तर - गृह अर्थव्यवस्था हमारे रहन-सहन के स्तर से भी प्रभावित होती है वर्तमान आधुनिक युग में सभी लोग रहन-सहन के स्तर को ऊंचा उठने के लिए प्रयत्नशील दिखाई देते हैं वैसे तो ठीक है क्योंकि रहन-सहन का स्टार परिवार की प्रतिष्ठा को दर्शाता है लेकिन जहां तक हो रहन-सहन के स्तर को अपनी पारिवारिक आय के अनुकूलन रखना चाहिए इस मध्य पर आए से अधिक खर्च करने पर अर्थव्यवस्था का को प्रभाव पड़ेगा
गृह अर्थव्यवस्था में ग्रहणी की भूमिका-
सामान्य रूप से गृह अर्थव्यवस्था को कार्य रूप देने का दायित्व गृहणी का होता है इस स्थिति में गृहणी का दायित्व होता है कि वह परिवार की संपूर्ण व्यवस्था का निर्धन परिवार की आय को ध्यान में रखकर ही करें
अच्छी गृहणी का एक गुण माना जाता है मिट्टी व्ययता पूर्वक खर्च करना इस गुण से संपन्न ग्रहणीय परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति उनकी प्राथमिकता के आधार पर करती है
कुशल ग्रहणीय घर के लिए आवश्यक वस्तुओं को खरीदते समय भी विशेष सूझबूझ से कम लेती है उचित स्थान से कम से कम मूल्य देकर अधिक सेवा देने वाली वस्तु खरीदना ही समझदारी कहलाती है ऐसा करके कुशल ग्रहणीय कुछ धन की बचत कर लेती है तथा इस प्रकार से की गई बचत परिवार की आर्थिक व्यवस्था को उत्तम बनाने में सहायक सिद्ध होती है
उपयुक्त कार्यों के अतिरिक्त कुशल एवं योग्य ग्रहणीय परिवार के अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष रूप से भी योगदान दे सकती है आजकल पढ़ी-लिखी अथवा किसी व्यवसाय का प्रशिक्षण प्राप्त महिला नौकरी करके अथवा किसी व्यवसाय में संकलन होकर धनोपाजर्न कर सकती है तथा परिवार की अर्थव्यवस्था को उत्तम बन सकती है इसके अतिरिक्त कुशल ग्रहणियां घर पर रहकर भी किसी हस्तशिल्प अथवा घरेलू व्यवसाय के माध्यम से धनोपाजर्न कर सकती है यही नहीं कुशल महिलाएं अपने ही बच्चों को पढ़कर उनके ट्यूशन पर होने वाले वे को बचा सकती है
उपयुक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि ग्रहणी की कुशलता अनिवार्य रूप से परिवार के आर्थिक व्यवस्था पर अनुकूलन तथा अच्छा प्रभाव डालती है कुशल ग्रहण या परिवार की अर्थव्यवस्था को अच्छा बनाने में प्रत्येक तथा प्रत्येक दोनों ही रूपों में योगदान दे सकती है
धन्यवाद-
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