मीराबाई

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मीराबाई

 "मैं आज आपको मेरा भाई के बारे में बताऊंगी "

पीर की गायिका और कृष्ण की प्रेम दीवानी मीराबाई का जन्म सन 1498 ईस्वी में राजस्थान में मेड़ता के समीप चौकड़ी नामक गांव में हुआ था जोधपुर के संस्थापक राज जोधपुर की प्रमुख अटरिया एवं रतन सिंह की पुत्री थी बचपन में ही उनकी माता का स्वर्गवास हो गया था उनका पालन पोषण दादा की देखरेख से राज्य थर्ड पार्ट के साथ हुआ इनके दादा राम दूध दादाजी बड़े धार्मिक स्वभाव के थे जिनका मेरा के जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा मेरा जब मात्र 8 वर्ष की थी तभी उन्होंने अपने मन में कृष्ण को पति रूप में स्वीकार कर लिया था उनकी भक्ति भावना के विषय में डॉक्टर राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है- 20 वर्ष की अवस्था में ही मेरा विधवा हो गई और जीवन का लौकिक आधार छिन जाने पर अब स्वाभाविक रूप से उनका 80 मिशन ने अनंत प्रेम और अद्भुत प्रतिभार स्रोत गीत धारा लाल की ओर उमर पाड़ा मेवाड़ की राजशक्ति का घोर विरोध सहन करके सभी कासन को सहन करते हुए विश्व का प्याला पीकर भी उन्होंने श्री कृष्ण के प्रति अपने भक्ति भावना को आश्वासन ने बनाए रखा 

 मीरा का विवाह चित्तौड़ के महाराणा सांगा के सबसे बड़े पुत्र भोजराज के साथ हुआ था विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति की है सामाजिक मृत्यु हो गई इसका मेरा के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि वह तो पहले से ही भगवान कृष्ण को अपने पति रूप में स्वीकार कर चुकी थी मैं सदैव श्री कृष्ण के चरणों में अपना ध्यान केंद्रित रखती थी मीरा के इस कार्य से परिवार के लोग रुष्ट रहते थे क्योंकि उनका यह कार्य राज करने की प्रतिष्ठा के विपरीत था 

 मीरा के भजन नए गीतों से सच्चे प्रेम की पीर और वेदना का बिरहा रूप एक साथ पाया जाता है मेरा को पूरा संसार मिथ्या प्रतीत हुआ है इसलिए वह कृष्ण भक्ति को अपने जीवन के आधार के रूप में स्वीकार करती है भक्ति करते-करते मेरा सन 1546 में द्वारिका में कृष्ण की भक्ति पूर्ति में विलीन हो गई

 मीराबाई के जीवन का उद्देश्य कविता करना नहीं था उनके भजन और गीत संग्रह उनकी रचनाओं के रूप में जाने जाते हैं नरसी जी का मेरा में गुजरात के प्रसिद्ध भक्त कवि नरसी की प्रशंसा की गई है इनके फुटकर पदों में विभिन्न रंगों में रचित पद मिलते हैं मेरा पदावली में इनके पदों का संकलन है यही उनकी प्रसिद्ध का एकमात्र प्रकार स्तंभ है 

 कृष्ण भक्त मीरा के जीवन का संभल था इसलिए मैं कठिन से कठिन लौकिक कासन को शहर से जेल गई में स्पष्ट शब्दों में रहती है मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा ना कोई मेरा के इस कथन में उनके कृष्ण प्रेम की सच्चाई है उनकी यही भक्ति भावना काव्य साधना के रूप में हिंदी साहित्य को प्रकाश में बनती है कृष्ण के प्रति इनका अन्य प्रेम दांपत्य जीवन के रूप में भी प्रकट हुआ यही कारण है कि उनके काव्य में श्रृंगार और शांत रस की धारा संगम के जल की भांति एक साथ बहती है मीरा के पदों में माधुरी का जो रूप मिलता है उसे भक्ति का सामान्य ज्ञान भी आनंद विभोर हो उठते हैं मीरा की भक्ति में सहजता सरलता और तन्यता का रूप एक साथी पाया जाता है मेरा के काव्य में कहीं भी पंडित दिए प्रदर्शन नहीं मिलता है मेरा के जीवन का उद्देश्य प्रेम भक्ति है संपूर्ण द्वारा अपने प्रियतम कृष्ण को पाना था काव्या सर्जन द्वारा यश प्राप्त करना नहीं 

 कार्य क्षेत्र - कवियत्री

  धन्यवाद




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