कबीर दास

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 मैं आज आपको संत कबीर दास के बारे में बताने जा रही हूं

डॉ नरेंद्र के हिंदी साहित्य के अनुसार प्रसिद्ध मां समाज सुधारक और संत कवि कबीर दास का जन्म 1348 ईस्वी में हुआ था एक की वेदांती के अनुसार इनका जन्म वाराणसी में लहरतारा नामक स्थान पर एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था लोक लाज के पैसे उसने बच्चे को एक तालाब के किनारे फेंक दिया उनके जन्म के संबंध में यह दुआ प्रचलित है 

चौदह पचपन साल गए चंद्रवार इक  ठाठ ठये

 जेठ सुदी बरसाइत को पूर्णमासी प्रगट भय

 कबीर का पालन पोषण नीरू नीमा नामक एक 1997 मुसलमान जुलाहा दंपति ने किया इस प्रकार कबीर में हिंदू मुस्लिम दोनों धर्म के संस्कार जन्म से ही आ गए कबीर की शिक्षा दीक्षा का कोई प्रबंध नहीं था वह साधु संतु और फकीरों के पास बैठकर ज्ञान प्राप्त करते थे उन्होंने "मासी कागज छोड़ नहीं कलाम करना नहीं हाथ " कहकर अपने को अनपढ़ बताया है कहते हैं कि इनका बचपन मंदिर में व्यतीत हुआ किंतु बाद में काशी आ गए मंगरा के विषय में एक ब्राह्मण अवधारणा को छुतलाने के लिए अपने अंत समय में यह पुणे मांग रहा आ गए थे 

 काशी के प्रसिद्ध संत रामानंद कबीर के गुरुदेव कहा जाता है कि रामानंद का शिक्षित प्राप्त करने के लिए यह अंधेरे अंधेरे प्राप्त कल गंगा घाट की सीढ़िया पर जाकर लेट गए रामानंद जब गंगा स्नान के लिए आए तो उनका पर कबीर के ऊपर रखा गया में राम-राम कहते हुए पीछे हट गए इसी को गुरु मंत्र मानकर कबीर ने रामानंद का शिष्यता ग्रहण किया कुछ लोगों ने ताकि से को कबीर का गुरु बताया है किंतु स्वयं ताकि से को उपदेश देने वाले कबीर उनके शिष्य नहीं हो सकते कबीर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मैं काशी में पैदा हुआ और मुझे गुरु रामानंद से ज्ञान प्राप्त हुआ

 बड़े होकर कभी अपने माता-पिता के कार्यों में हाथ बढ़ाने लगे और बच्चे समय में ईश्वर भक्ति करते तथा विभिन्न संप्रदाय के धर्माचार्य की संगति में रहते इससे उनके ज्ञान क्षेत्र का विस्तार हुआ कबीर का विवाह लोइ नामक एक कन्या से हुआ था जिस कमाल और कमाली नामक इनकी दो संतान उत्पन्न हुई कबीर का ग्रस्त जीवन सुख में नहीं था कुछ दिनों पश्चात उन्होंने अपनी पत्नी से संबंध विच्छेद कर लिया यह अपने पुत्र कमाल की गतिविधियों से भी चिंतित रहते थे क्योंकि वह ईश्वर भक्ति से विमुख रहता था 

 काशी में करने वाले सूरत प्राप्त करते हैं और मंदिर में करने वाले निराला प्राप्त करते ही सुधारना को निर्मल सिद्ध करते हुए कबीर अपना संपूर्ण जीवन काशी में बिताने के पश्चात मृत्यु के समय मुंगरा चले आए यही 120 वर्ष की आयु में इनका स्वर्गवास हो गया उनकी मृत्यु के संबंध में यह दुआ प्रचलित है

 संवत पंद्रह सौ पचहतर, किए मगहर को गौन 

 माघ सुदी एकादशी राहो पौन में पौन 

 इनका निधन 1518 ईस्वी में मंगरा में हुआ था उनके अंतिम संस्कार को लेकर हिंदू मुस्लिम में खूब विवाद हुआ क्योंकि हिंदू इनका दाह संस्कार करना चाहते थे जबकि मुसलमान अपनी परंपरा के अनुसार इन्हें दफनाना चाहते थे कहा जाता है कि जब इनके सबसे कफ़न उठाया गया तो सबके स्थान पर कुछ पुष्प रखे थे जिन्हें दोनों धर्मो ने अनुयायियों ने आधा-आधा बांट लिया 

 कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे इसलिए इन्होंने किसी काव्य ग्रंथ की रचना नहीं की थी इनका अध्ययतम ज्ञान उच्च कोटि कथा समाज में व्यापक कुरीतियों एवं आठ मेंबरों पर इन्होंने खूब रहा किया धर्म के बाहरी आचार्य व्यवहारों तथा कर्मकांडों पर उनकी ली मात्रा भी आस्था न थी यह जब तब में विश्वास नहीं करते थे मूर्ति पूजा और जान आदि का इन्होंने ठक्कर विरोध किया व्यर्थ की रोटियां और परंपराओं के विरुद्ध इन्होंने समाज को जागृत किया विलेक्शन प्रतिभा के धनी कबीर वास्तव में उत्कृष्ट रहस्यवादी समाज सुधारक पाखंड के आलोचक तथा मानवता के पोषक थे

 कबीर क्योंकि अनपढ़ते रहता है उनके मुख्य से निकलने वाली अमृतवाणी को उनके शिष्यों ने लिपि व्रत किया इनके धर्म वास नमक शिष्य ने उनकी रचनाओं का संग्रह बीजक नाम से किया यह सखी संबंध रिमिनी तीनों भागों में विभक्त है सखी में कबीर का साक्षात ज्ञान है यह दोहा छंद से लिया गया है इसमें कबीर का जीवन अनुभाग्य आंतरिक निहित है डॉक्टर श्यामसुंदर दास ने सन 1928 ईस्वी में कबीर की संपूर्ण रचनाओं को कबीर ग्रंथावली नमक से नागरी प्रचारिणी सभा काशी से प्राप्त कराया




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