" मैं आज आपको एक महान कवि के बारे में बताने जा रही हूं जिनका नाम हजारी प्रसाद द्विवेदी जी है"
हिंदी के मुंह धरने का कारण में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की गणना होती है इनका जन्म स्थान 1909 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के दुबे का छपरा गांव में हुआ था उन्होंने आजीवन साहित्य साधना में लगे रहकर हिंदी साहित्य को अनेक उत्कृष्ट कर दिया प्रदान की उपन्यास निबंध विधाओं में इन्हें विशेषता सफलता प्राप्त हुई हिंदी साहित्य में उनके महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हुए डॉक्टर द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने कहा कि डॉक्टर द्विवेदी अपने अद्भुत रचना कौशल विविध विचार प्रदर्शन एवं द्विवेदी अपने अद्भुत रचना कौशल विविध विचार प्रदर्शन एवं अनुपम अभिव्यंजना में विद्या के कारण साहित्य के क्षेत्र में मुंह धनिया स्थान के अधिकारी है आचार्य द्विवेदी जी के पिता का नाम पंडित अनमोल द्विवेदी और माता का नाम श्रीमती ज्योति काली था उनके पिता ज्योतिष विद्या के महान ज्ञाता थिएटर में अपने पुत्र को भी ज्योतिषचर्य बनाना चाहते थे इसलिए शिक्षा का प्रारंभ संस्कृत से हुआ इन्होंने अपने पिता की इच्छा अनुसार इंटर करने के अपरांत काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिष तथा साहित्य में आचार्य की परीक्षा उत्तरण की सन 1940 ईस्वी में यह हिंदी एवं संस्कृति के अध्यापक के रूप में शांति निकेतन गए वहां अनेक वर्षों तक कार्य करते हुए यह गुरुदेव रविंद्र नाथ के निकट संपर्क में आ गए तत्व प्रांत यह काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यक्ष नियुक्त हुए कुछ समय तक आपने पंजाब विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया
द्विवेदी जी की साहित्य सेवा के परिणाम स्वरुप सन 1946 ईस्वी में लखनऊ विश्वविद्यालय ने इन्हें डिलीट की मानत उपाधि से सम्मानित किया और भारत सरकार ने सन 1957 ईस्वी में पद्मभूषण का अलंकरण प्रदान किया इन्हें इसकी आलोचनात्मक कृति कबीर पर मंगला प्रसाद प्रादेशिक भी प्रदान किया गया और साहित्य की आलोचना पर इन्हें इंदौर साहित्य सीमित ने स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया द्विवेदी जी की साहित्य चेतना निरंतर जागृत रही और वह आजीवन साहित्य सर्जन मैं लग रहे रोगाणावस्था के कारण इनका 72 वर्ष की आयु में अस्वस्थतहाट के कारण 17 में 1971 ई को देहब आसान हो गया द्विवेदी जी उच्च कोटि के निबंधकार उपन्यास आलोचक चिंतक और ओढ़कर्ता द बलिकाल में ही उन्होंने व्योम के शास्त्री से कविता लिखने की कला सीखनी आरंभ कीसेंस इसकी साहित्यिक प्रतिभा बिलसंता को प्राप्त होने लगी कवींद्र रवींद्र और बंगाल के साहित्य का उनके साहित्य पर अत्यधिक प्रभाव दृष्टि को चोर होता है सिद्ध साहित्य जैन साहित्य ऊपर ब्रिज साहित्य एवं भक्ति साहित्य को अपना आलोचनात्मक दृष्टि से आलोकित करके इन्होंने इन साहित्य का बड़ा उपकार किया
हजारी प्रसाद जी के प्रमुख रचनाएं और उपन्यास -
' बाणभट्ट की आत्मकथा' 'पुनर्नवा का नाम दास का पौथा 'चारु चंद्र' आदि
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