परिवार की मूलभूत आवश्यकता है

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" परिवार के सदस्यों की आवश्यकता है, अनंत होती है किंतु एक सुख रहने उनमें से अपनी अर्थव्यवस्था के अनुरूप उनका समायोजित करती है"

  प्रस्तावना-

 मनुष्य की आवश्यकता है अनंत होती है एक आवश्यकता के पश्चात दूसरी आवश्यकता स्वामी उत्पन्न हो जाती है किंतु यह भी सत्य है कि यदि आवश्यकता है उत्पन्न ना हो तो आविष्कार भी ना होते कहा गया है की आवश्यकता आविष्कार की जननी है आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य आर्थिक प्रयास करता है और वह आवश्यकताओं को दर्शन पूरा करता है परंतु सीमित साधनों में ही असीमित आवश्यकताओं की पूर्ति करनी पड़ती है अतः गृहणी का उत्तरदायित्व है कि वह घर के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर उन्हें संतुष्टि प्रदान कर सके

 आवश्यकताओं का अर्थ तथा पूर्ति का महत्व:-

 आवश्यकता मनुष्य का प्राकृतिक गुण है गर्भावस्था से मानव की आवश्यकता प्रारंभ हो जाती है और जीवन पर्यटन चलती रहती है जन्म के पश्चात मनुष्य की आवश्यकता है बढ़ती जाती है और मनुष्य इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति करता रहता है मनुष्य की संसद क्रियाएं विभिन्न आवश्यकताओं द्वारा प्रेरित होती है

 कोई भी आवश्यकता बिना इच्छा है तत्परता के आवश्यकता नहीं बन सकती दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि- आवश्यकता वह प्रबल इच्छा है जिसे पूरा करने के लिए व्यक्ति के पास उचित साधन उपलब्ध हो तथा वह उन साधनों का उपयोग करने के लिए तत्पर हो अर्थात आवश्यकता के मूल में इच्छा वह साधनों के उपयोग करने की तत्परता का होना आवश्यक है

 डॉक्टर बेस के अनुसार केवल वही इच्छाएं आवश्यकता होती है जिन्हें पूर्ण किया जा सकता है जिन्हें पूरा करके योग्य कार्य में लाने की तत्परता भी हो

 इसी परिभाषा के अनुसार किसी व्यक्ति को किसी वस्तु की इच्छा हो तथा उसे पूरा करने के लिए उसके पास साधन भी हो तो उसकी वह इच्छा उसकी आवश्यकता बन जाएगी

 इस प्रकार आवश्यकता के तीन तत्व होते हैं-

1.इच्छा आवश्यकता में तभी परिवर्तित हो सकती है जब उसकी पूर्ति की जा सके जिन इच्छाओं को बुरा नहीं किया जा सकता में आवश्यकता नहीं कहीं जा सकती 

2. इच्छा को आवश्यकता में बदलने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति अपने साधनों को प्रयोग करने के लिए तत्पर हो

3. इच्छा आवश्यकता तभी बन सकती है जबकि व्यक्ति के पास इच्छा पूर्ति हेतु साधन उपलब्ध हो

  परिवार की मूलभूत आवश्यकता है एवं उनका वर्गीकरण -

 प्राचीन काल में मनुष्य की आवश्यकता है सीमित होती थी तथा उन आवश्यकताओं की पूर्ति आसानी से संभव होती थी परंतु आज के वर्तमान वैज्ञानिक युग में निरंतर बढ़ती हुई आवश्यकता के कारण मनुष्य का जीवन जटिल होता जा रहा है प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा कमाया गया धन आवश्यकताओं की तुलना में काम होता है इसलिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक ग्रहणी परिवार की सारी आवश्यकताओं के विषय में जाने और आए के जो साधन हो उनके द्वारा परिवार की आवश्यकता की इच्छा को अधिकतम संतुष्ट करें

 विभिन्न विद्वानों ने आवश्यकताओं को अलग-अलग प्रकार से विभाजित किया है

 कुछ विद्वानों द्वारा आवश्यकता के दो भागों में विभाजित किया गया है 1. प्रारंभिक आवश्यकता है 2.गौण आवश्यकता

 




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