क्योंकि आध्यात्मिक तत्व ज्ञान योग के अनेक उल्लेख ऋषि पतंजलि के संसार में आने से कहीं पहले अनेक हिंदू जाति के धार्मिक ग्रंथो में पाए जाते हैं, जो हिरनिर्णयगर्भ योग दर्शन के नाम से विख्यात है, इसलिए हमारी उनसे परे है हिरनिर्णयगर्भ का अर्थ है शस्वर्णिम बर्न जो एक वैदिक ईश्वर प्रया सूर्य देव के रूप में प्रकट होता है। महाभारत में हिरनिर्णयगर्भ का एक ऐसे अस्तित्व के रूप मैं अभिवादन किया गया है, जिसका गुणगान वैदिक मेट्रो में किया गया है और जिसे योग सूत्र में पढ़ाया जाता है। संपूर्ण युवक्त ब्रह्मांड के हिरणयगर्भ मैं विद्यमान पाए जाते हैं, जिससे संपूर्ण रचना प्रदू भार्व हुआ है अभाज्य रूप में से हो रहा है समस्त पतंजलि पूर्ण योग साहित्य (वेद, उपनिषद, गीता, महाभारत तथा पुराण ) का आरंभ हिरणयगर्भ से ही हुआ है तथा समस्त पतंजलि परिचय साहित्य सनातन सहित्य से ही अभिप्रेरणा प्राप्त करता है। एक अनेक पतंजलि पूर्ण रचनाओं योग सूत्र, "अधिकारी योग उपदेश"योग दर्शन अथवा योग तत्वज्ञान का उल्लेख करती है। इसलिए समस्त जटिल आध्यात्मिक दर्शन तथा वह सभी कुछ जिसका अभ्यास तथा जिसकी प्रयुक्ति दैनिक जीवन को स्वास्थ्य सुत तथा दयानी बनाने के उद्देश्य से होती हैं, हिरणयगर्भ सनातन परंपरा की ही उपज है।
भगवत गीता जो महाभारत में श्री कृष्ण अर्जुन शमशाबाद के रूप में समाई हुई है -को प्रथम योग शास्त्र अर्थात अधिकारी योग प्रदेश के रूप में मान्यता प्राप्त है महाभारत में गुरु कुलश्रेष्ठ भीष्म पितामह ने अनेक शिष्यापित की योग शास्त्र की और संकेत किया है, जिनमें योगोंपदेश की विद्यमानता एक यथार्थ है अनेक उपनिषद-जैसे कठोपनिषद अपने आप में योग शास्त्र है इसके अतिरिक्त अनेक उपनिषद योग की तो बात करते है परंतु पतंजलि की नहीं । उसी प्रकार पुराने में भी संबंध अनेक अध्याय paye jaate Hain ऐसी सभी लोगों प्रदेश प्रदान करने वाली रचनाएं पुरातन वेदों से ही उदाहरण समस्त तत्व प्राप्त करती है। यह सभी तथ्य इस बात का सुपरहिट प्रणाम है की pantjali ka योग दर्शन वास्तव में हिरनिर्णयगर्भ दर्शन का ही एक नूतन संपूर्ण है इसलिए इसे ना तो एक मौलिक रचना ही माना जा सकता है और ना ही इसका कोई अपना अस्तित्व ही है यम , niyam se लेकर धरना तथा संबंधी जैसे सभी प्रकरण प्रांतन साहित्य में पूरे विवरण के साथ पहले से ही प्रस्तुत किए गए हैं महाभारत शांति पूर्ण प्रकरण में ऋषि यज्ञ को वेदों में अष्टांग योग प्रदेश संकेत करते हैं बताया गया है इस प्रकार शांडिल लिए उपनिषद में अष्टांग योग का तो उल्लेख मिलता है परंतु ऋषि पतंजलि का नहीं।
हिरनिर्णयगर्भ योग सूत्र से संबंध कोई भी सरल सुगम कृति आज पतंजलि योग परंपरा की तुलना में हिरनिर्णयगर्भ योग परंपरा कहीं अधिक वृद्ध एवं समृद्धह पतंजलि योग केवल इसकी एक है बिना हिरनिर्णयगर्भ योग परंपरा जो जो योग प्रदेश की सनातन मौलिक परंपरा है, पर दृष्टि पड़ के पतंजलि योग परंपरा की वाक्य करना कदाचित संभव नहीं है। पतंजलि योगपदेश का विवरण केवल योग दर्शन में ही है जिसमें कई अन्य धारणाएं bhi Shamil Hai pantjali se purv Keval ek yog Darshan vidhmaan tatha jiska हिरनिर्णयगर्भ संबंध वैदिक की ही दिन था
मानव इतिहास के सिंदूर कल से आरंभ होकर योग परंपरा शास्त्रों शताब्दियों से हमारी सस्कृति धरोहर रूप में विद्यमान रही है भगवत Geeta mein Shri Krishna ने कहा कि उन्होंने सर्वप्रथम योग का मलिक ज्ञान विश्वास अर्थात सूर्य देव को प्रदान किया था, जो हिरनिर्णयगर्भ की ओर इंगित करता है इसके अतिरिक्त महाभारत शांति पूर्ण 340-350 तथा अन्य रचनाएं हिरनिर्णयगर्भ की पहचान ब्राह्मण अर्थात प्रजापति जो हिंदू त्रिमूर्ति se sarjanakta है के साथ करती है जो अन्य बातों के अतिरिक्त वेदों का भी प्रतिनिधित्व करता है तथा समस्त उच्चतर ज्ञान का मूल स्रोत है यह हिरनिर्णयगर्भ कि पहचान बुद्धि अथवा महता अर्थात उच्चतर ब्राह्मण दिए मन एस महाभारत 302-18 के साथ करता है , जिसमें ब्राह्मण की निकटता उद्घोषित होती है अपने अनुभव तथा प्रजा शारीरिक से मानसिक तथा आत्मक शास्त्रों से ऊंचा उठकर प्राचीन rishiyon Ne is gyan ko abhi spasht Kiya tatha use rigved mein Manav ke buddhi prasthan kar mein prativedit kiya।
प्राचीन ग्रंथो के राजा ऋषि वशिष्ठ को ही हिरनिर्णयगर्भ का मुख्य अनुयाई अर्थात वैदिक ऋषियोंमें अग्रिममना जाता है जिन्होंने महर्षि नारद को योग का उपदेश दिया योग दर्शन पर ऋषि वशिष्ठ का कथन है सत्य की परंपरा main hi yog Darshan ki yah vakya की है उन्होंने योग का ज्ञान अपने पुत्र ऋषि पाराशर को भी दिया जिसकी वंश परंपरा में मुन्नी Ved Vyas bhi aate Hain जिन्होंने वेदों का संकलन किया तथा महाभारत की रचना की। वशिष्ठ परंपरा में अनेक महत्वपूर्ण योग ग्रंथ आते हैं जिनमें वेस्ट वशिष्ठ साहित्य तथा योग वशिष्ठ सम्मिलित है योग तथा वेदांत की सावधानिक महान कीर्ति को योग वशिष्ठ ही मानी जाती हैं
इस प्रकार मौलिक योग
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इस प्रकार मौलिक योग परंपरा पतंजलि से आरंभहै
महाभारत में सांख्य योग तथा वेदांत की प्रस्तुति इसी प्रकार प्रारंभ के अंतर्गत की गई है
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