कुपोषण (Malnutrition) एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जो तब होती है जब शरीर को आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाते। भारत जैसे विकासशील देश में कुपोषण बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों में अधिक देखने को मिलता है। यह न केवल शरीर को कमजोर बनाता है बल्कि मानसिक विकास पर भी बुरा प्रभाव डालता है।
कुपोषण के कारण
कुपोषण के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. असंतुलित आहार
जब भोजन में प्रोटीन, विटामिन, खनिज और ऊर्जा की कमी होती है, तब कुपोषण होता है।
2. गरीबी
गरीब परिवार पौष्टिक भोजन खरीदने में असमर्थ होते हैं।
3. अज्ञानता
लोगों को संतुलित आहार और पोषण के महत्व की सही जानकारी नहीं होती।
4 बीमारियाँ
दस्त, टीबी, कृमि संक्रमण जैसी बीमारियाँ शरीर में पोषक तत्वों के अवशोषण को रोकती हैं।
5. स्वच्छता की कमी
गंदा पानी और खराब साफ-सफाई से संक्रमण बढ़ता है, जिससे कुपोषण होता है।
कुपोषण के प्रभाव
कुपोषण का शरीर और समाज दोनों पर गहरा प्रभाव पड़ता है:
1. शारीरिक कमजोरी
शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।
2. बच्चों के विकास में रुकावट
बच्चों की लंबाई, वजन और दिमागी विकास प्रभावित होता है।
3. मानसिक विकास पर असर
याददाश्त कमजोर होती है और सीखने की क्षमता घटती है।
4. बीमारियों का खतरा
संक्रमण जल्दी होता है और बीमारी से उबरने में समय लगता है।
5. मृत्यु दर में वृद्धि
गंभीर कुपोषण जानलेवा भी हो सकता है, खासकर छोटे बच्चों में।
कुपोषण की रोकथाम
कुपोषण को निम्न उपायों से रोका जा सकता है:
1. संतुलित आहार
दैनिक भोजन में दाल, हरी सब्जियाँ, फल, दूध, अनाज और प्रोटीन शामिल करें।
2. मातृ एवं शिशु पोषण
गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को विशेष पोषण मिलना चाहिए।
3. स्वच्छता
साफ पानी, हाथ धोने की आदत और स्वच्छ वातावरण जरूरी है।
4. पोषण शिक्षा
लोगों को पोषण के प्रति जागरूक करना बहुत आवश्यक है।
5. सरकारी योजनाएँ
आंगनवाड़ी, मिड-डे मील, पोषण अभियान जैसी योजनाओं का सही लाभ उठाना चाहिए।
निष्कर्ष
कुपोषण एक सामाजिक और स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्या है, लेकिन सही जानकारी, संतुलित आहार और जागरूकता से इसे रोका जा सकता है। स्वस्थ शरीर और उज्ज्वल भविष्य के लिए कुपोषण मुक्त समाज बनाना हम सभी की जिम्मेदारी है।
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